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COVID ने भारत में बाल मजदूरी की समस्या को बढ़ाया, राजस्थान में ₹50 के लिए दिन में 18 घंटे करना पड़ रहा काम

तारीख: 14 सितंबर, 2021
स्रोत (Source): द प्रिंट

तस्वीर स्रोत : द प्रिंट

स्थान : राजस्थान

चार गुना चार फीट के दो कमरे, कोई खिड़की नहीं, पंखा काम नहीं करता और दीवारों पर पान के निशान. उन्नीस बालक वहां बैठते हैं, फर्श पर, और उनकी फुर्तीली उंगलियां लाख की चूड़ियों पर, चमक और कांच के टुकड़े चिपकाती रहती हैं. हर बच्चा झुककर काम करता है. बिना किसी मास्क के, बिना किसी सोशल डिस्टैन्सिंग के और वो हर रोज़ 400-500 चूड़ियां तैयार करता है. पूरे राजस्थान के बाज़ारों में ऐसी एक चूड़ी, 10 से 50 रुपए में बिकती है. बालक 16-18 घंटे काम करते हैं और दिन भर में केवल 50 रुपए कमाते हैं, जो राजस्थान में 252 रुपए प्रतिदिन की न्यूनतम मज़दूरी से बहुत कम है.

वो बालक जिन्हें स्कूलों में होना चाहिए, पूरे राजस्थान में डिकेन्स के उपन्यासों जैसे हालात में काम करते हैं, ज़्यादाकर चूड़ी कारख़ानों में और बाक़ी सड़क किनारे ढाबों, टायर की दुकानों, और साड़ी छपाई की वर्कशॉप्स आदि में, अपने परिवारों की मदद करते, जिनका या तो कोविड-19 महामारी में काम छूट गया या परिवार में कोई मौत हो गई. लंबे समय तक झुकी गर्दन और कंधे, धूप में टिमटिमाती आंखें और कुपोषण से तबाह शरीर- ये सब कोविड के अनदेखे शिकार हैं.

2011 की जनगणना के अनुसार, भारत में बाल श्रमिकों की कुल संख्या 1.01 करोड़ है, जिसमें 56 लाख लड़के हैं, और 45 लाख लड़कियां हैं. अगली जनगणना 2021 में होनी है, लेकिन बाल अधिकार संगठनों के सर्वेक्षणों से संकेत मिलता है कि कोविड के बाद बड़े पैमाने पर फैली ग़रीबी के चलते, पूरे देश में बाल मज़दूरी में तेज़ी से बढ़ोतरी हुई है.

अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन (आईएलओ) और यूनिसेफ ने भी चेतावनी दी है कि भारत में स्कूलों का बंद होना और संवेदनशील परिवारों के सामने आया आर्थिक संकट, संभवत: बालकों को ग़रीबी में धकेल रहा है और इस तरह भारत में कोविड के बाद बाल मज़दूरी बढ़ने का ख़तरा पैदा हो गया है. ज़्यादातर प्रवासी श्रमिकों का ताल्लुक़ बिहार, यूपी, पश्चिम बंगाल, छत्तीसगढ़, और झारखंड जैसे कम आय वाले सूबों से है.

 

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