लैंगिक उत्पीड़न पर बॉम्बे हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ तत्काल अपील दायर करे राज्य सरकार: बाल आयोग

तारीख: 26 जनवरी, 2021
स्रोत (Source): amarujala.com

तस्वीर स्रोत: गूगल इमेज

स्थान: मुंबई, महाराष्ट्र

बॉम्बे हाईकोर्ट द्वारा लैंगिक उत्पीड़न को लेकर दिए गए एक फैसले को लेकर राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (एनसीपीसीआर) ने महाराष्ट्र सरकार को लैंगिक उत्पीड़न मामले में बॉम्बे हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ तत्काल अपील दायर करने के लिए कहा है. अपने फैसले में हाईकोर्ट ने कहा था कि कपड़ों के ऊपर से बालिका के शरीर को छूना लैंगिक हमला नहीं माना जा सकता है. आयोग के अध्यक्ष प्रियंक कानूनगो ने महाराष्ट्र के मुख्य सचिव को लिखे पत्र में कहा कि फैसले की समीक्षा की जानी चाहिए और राज्य को इसका संज्ञान लेना चाहिए क्योंकि नाबालिग पीड़ित के लिए यह बेहद अपमानजनक है. आयोग ने सरकार से नाबालिग पीड़ित की जानकारी मुहैया कराने को भी कहा है ताकि आयोग की ओर से उसे कानूनी सहायता उपलब्ध कराई जा सके.

हाईकोर्ट की नागपुर पीठ की जस्टिस पुष्पा गनेड़ीवाला के 19 जनवरी को दिए आदेश में कहा था कि लैंगिक संबंध बनाने के इरादे से कपड़ों के अंदर हाथ डालकर या उन्हें हटाकर छूने का प्रयास करना ही लैंगिक हमला माना जा सकता है. महज कपड़ों के ऊपर से जकड़ना लैंगिक हमले की परिभाषा के तहत नहीं आता. आरोपी ने बिना कपड़े हटाए बालिका को जकड़ा था, इसलिए उसका अपराध को लैंगिक हमला नहीं कहा जा सकता. हालांकि यह आईपीसी की धारा 354 के तहत महिला की लज्जा भंग करने के अपराध की श्रेणी में आएगा.

ऐसे मामलों में अपराध करने वाले शख्स की मंशा व मानसिकता की काफी अहमियत होती है. अगर कपड़ों के ऊपर से होने वाला स्पर्श सामने वाली महिला/पुरुष ( जो 18 वर्ष या उससे अधिक उम्र का/की है) की मंजूरी से हो रहा है, तो इसे अपराध नहीं माना जाएगा क्योंकि इस कृत के लिए दोनों पक्ष आपस में राजी थे. वहीं, अगर सामने वाले शख्स की अनुमति के बिना उसके अंगों को कपड़े के ऊपर से स्पर्श करना अनैतिक होने के साथ एक लैंगिक अपराध भी होता है. ऊपर दिए गए मामले में स्पष्ट रूप में आरोपी द्वारा बालिका को जकड़ने का जिक्र है, जिसमें कपड़ा न हटाए जाने को लेकर इसे लैंगिक हमला नहीं माना गया है. आरोपी ने जब बालिका को जबरन जकड़ रखा था तो आरोपी को कपड़े हटाने में कितना वक्त लगता? साथ ही ऐसी घटना के बाद बालिका को दैनिक आधार पर इससे जुड़े मानसिक आघात का सामना करना पड़ता है, जो उसे डर-डर के जीने के लिए मजबूर करता है. वहीं जब इस तरह के मामलों में पीड़िता/पीड़ित नाबालिग होता/होती है, तो सबूतों के आधार पर आरोपी की मंशा पर फैसला लिया जाता है क्योंकि नाबालिग द्वारा दी गई अनुमति को न्यायालय में स्वीकार नहीं किया जाता है.

 

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