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क्या पति पर धारा 377 आईपीसी के तहत मुकदमा चलाया जा सकता है, जब धारा 375 आईपीसी वैवाहिक लैंगिक संबंध से छूट देती है? दिल्ली हाईकोर्ट विचार करेगा

तारीख:  03 मार्च, 2022

स्रोत (Source): लाइव लॉ हिंदी

तस्वीर स्रोत : लाइव लॉ हिंदी

स्थान : दिल्ली

दिल्ली हाईकोर्ट में दायर एक याचिका में यह घोषणा करने की मांग की गई है कि भारतीय दंड संहिता की धारा 377 के तहत एक पति पर पत्नी के साथ अप्राकृतिक लैंगिक संबंध के अपराध के लिए मुकदमा नहीं चलाया जा सकता है, जब धारा 375 का अपवाद 2 वैवाहिक लैंगिक संबंध को बलात्कार के अपराध से छूट देता है. हाईकोर्ट ने उक्त याचिका को याचिकाओं के एक बैच से अलग कर दिया है, जिनमें वैवाहिक बलात्कार के अपराधीकरण की मांग की गई थी. जस्टिस राजीव शकधर और जस्टिस सी हरिशंकर की खंडपीठ ने कई दिनों तक चली लंबी सुनवाई के बाद संहिता की धारा 375 के अपवाद के खिलाफ दायर याचिकाओं पर अपना फैसला सुरक्षित रख लिया है.

याचिका को याचिकाओं के उक्त बैच से अलग करते हुए कोर्ट ने कहा कि वह 11 मार्च को इसे सूचीबद्ध करते हुए मामले की अलग से सुनवाई करेगा. कोर्ट ने कहा, “चूंकि उपर्युक्त याचिका में उठाया गया मुद्दा रिट याचिकाओं के समूह यानी WP (C) Nos. 284/2015, 5858/2017, 6024/2017 और WP (Crl.) No.964/2017 से गुणात्मक रूप से अलग है. उस याचिका को इस बैच से अलग करने का आदेश दिया जाता है. इस रिट याचिका पर अलग से सुनवाई की जाएगी.”

एडवोकेट अमित कुमार की ओर से दायर याचिका में सवाल उठाया गया है कि क्या धारा 375 में 2013 का संशोधन कानूनी रूप से विवाहित नागरिकों के लिए धारा 377 के साथ असंगत है. 2013 के संशोधन के बाद बलात्कार के अपराध के दायरे का विस्तार किया गया है, जिसमें लिंग-योनि के अलावा अन्य मर्मज्ञ कृत्यों (penetrative acts) को भी शामिल किया गया है. याचिकाकर्ता का तर्क है कि इसलिए जब धारा 375 का अपवाद 2 वैवाहिक लैंगिक संबंध को बलात्कार के अपराध के दायरे से बाहर करता है तो धारा 377 आईपीसी के तहत नॉन वैजिनल पेनेट्रेट‌िव सेक्सुअल एक्ट के लिए पति पर मुकदमा चलाना असंगत है.

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